मुख्य बात: बच्चे के सामने माता-पिता के नियम स्पष्ट, स्थिर और एक जैसे होने चाहिए।
बच्चे की परवरिश को लेकर माता-पिता की सोच अलग होना असामान्य नहीं है। कोई अनुशासन पर जोर देता है तो कोई बातचीत, समझाइश और आजादी को ज्यादा महत्व देता है। लेकिन जब बच्चा समझने लगे कि मां से मना होने पर पिता से अनुमति मिल सकती है या इसका उल्टा हो सकता है, तो स्थिति उसके व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर डॉ. अमिता श्रृंगी के अनुसार ऐसे मामलों में माता-पिता के बीच तालमेल जरूरी है।
मुख्य बातें
- माता-पिता की सोच अलग होना अपने आप में गलत नहीं है।
- एक ही स्थिति में अलग नियम बच्चे को भ्रमित कर सकते हैं।
- एक पेरेंट से मना होने पर दूसरे से पूछने को ‘पेरेंट शॉपिंग’ कहा जाता है।
- बच्चे नियमों की सख्ती से ज्यादा उनकी कंसिस्टेंसी यानी एकरूपता समझते हैं।
- प्यार और अनुशासन के बीच संतुलन रखना जरूरी है।
क्या हुआ
एक 36 वर्षीय वर्किंग महिला ने अपने 9 साल के बेटे की परवरिश को लेकर सवाल किया। वह चाहती हैं कि बेटा अपनी गलतियों से सीखे और उससे समझाकर बात की जाए, जबकि उनके पति बच्चे को टफ बनाने और अनुशासन सिखाने में विश्वास रखते हैं। कई बार मां किसी मांग पर हां कहती हैं तो पिता मना कर देते हैं। बेटा भी समझ गया है कि किस मांग के लिए किस पेरेंट के पास जाना है।
मुख्य जानकारी
डॉ. अमिता श्रृंगी के अनुसार 9 साल की उम्र तक बच्चा समझने लगता है कि किस व्यक्ति से कैसी प्रतिक्रिया मिलेगी। यह जरूरी नहीं कि वह गलत इरादे से ऐसा करे। कई बार यह सीखा हुआ व्यवहार होता है। जब नियम पहले से तय नहीं हों, माता-पिता अलग फैसले लें या बच्चे के सामने एक-दूसरे का फैसला बदल दें तो ‘पेरेंट शॉपिंग’ बढ़ सकती है।
समाधान के लिए रोजमर्रा के महत्वपूर्ण नियम माता-पिता को पहले आपस में तय करने चाहिए। नियम बदलना हो तो दोनों चर्चा करके बच्चे को नया नियम बताएं। बच्चे के सामने एक-दूसरे का फैसला काटने के बजाय कहा जा सकता है, ‘हम दोनों इस पर बात करेंगे और फिर तुम्हें बताएंगे।’
स्थानीय प्रभाव
जयपुर की साइकोलॉजिस्ट डॉ. अमिता श्रृंगी की सलाह परिवारों के लिए यह स्पष्ट करती है कि स्वस्थ पेरेंटिंग में सिर्फ सख्ती या सिर्फ छूट के बजाय संतुलन महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक अलग-अलग नियम रहने पर बच्चा सीमाओं को लेकर भ्रमित हो सकता है और माता-पिता के रिश्ते पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
लोगों के लिए जरूरी जानकारी
पेरेंट्स को ‘एक सख्त और एक नरम’ वाला स्थायी पैटर्न बनाने से बचना चाहिए। दोनों बच्चे को प्यार दें और जरूरत पड़ने पर दोनों नियम लागू करें। 9 साल के बच्चे को कुछ नियमों की निर्णय प्रक्रिया में भी शामिल किया जा सकता है। उससे नियम और उसे तोड़ने के परिणाम के बारे में राय पूछी जा सकती है।
आगे क्या
अगर पेरेंटिंग के फैसलों पर बार-बार टकराव हो, बच्चा बातें छिपाने या झूठ बोलने लगे, स्कूल से व्यवहार संबंधी शिकायतें आएं या घर का तनाव बच्चे को प्रभावित करने लगे तो फैमिली काउंसलर या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की सलाह मददगार हो सकती है।
निष्कर्ष
माता-पिता के व्यक्तित्व और सोच अलग हो सकते हैं, लेकिन बच्चे की परवरिश के महत्वपूर्ण फैसलों में तालमेल जरूरी है। स्पष्ट और स्थिर नियम बच्चे को यह समझने में मदद करते हैं कि उससे किस तरह के व्यवहार की अपेक्षा है। प्यार, संवाद और अनुशासन के संतुलन के साथ माता-पिता का टीम की तरह काम करना स्वस्थ पेरेंटिंग की मजबूत नींव बन सकता है।
FAQs
1. क्या माता-पिता की अलग पेरेंटिंग स्टाइल गलत है?
नहीं। अलग सोच सामान्य है, लेकिन बच्चे के सामने एक ही स्थिति में विरोधी नियम देने से समस्या हो सकती है।
2. पेरेंट शॉपिंग क्या है?
एक पेरेंट से मनचाहा जवाब न मिलने पर बच्चा उसी मांग को लेकर दूसरे पेरेंट के पास जाता है तो इसे पेरेंट शॉपिंग कहा जाता है।
3. बच्चे के सामने पेरेंट्स में असहमति हो तो क्या करें?
तुरंत एक-दूसरे का फैसला बदलने के बजाय आपस में चर्चा करके बाद में बच्चे को साझा निर्णय बताएं।
4. क्या बच्चे को नियम बनाने में शामिल करना चाहिए?
9 साल का बच्चा कुछ नियम समझ सकता है और उन पर अपनी राय दे सकता है। इससे नियमों के पालन की संभावना बढ़ सकती है।
5. एक्सपर्ट की मदद कब लेनी चाहिए?
लगातार पेरेंटिंग विवाद, बच्चे का बातें छिपाना या झूठ बोलना, स्कूल से व्यवहार संबंधी शिकायतें या घर के तनाव का बच्चे पर असर दिखाई देने पर विशेषज्ञ की सलाह मददगार हो सकती है।




